विद्यापति भक्ति कवि या श्रृंगार कवि | विद्यापति पदावली | विद्यापति की रचना

आदिकाल के प्रसिद्ध कवि विद्यापति की साहित्यिक प्रतिष्ठा मूलत: 'पदावली' के कारण है। पदावली कि कई विशेषताएं हैं, किन्तु इसका केन्द्रीय विषय राधा-कृष्ण प्रेम है। यह हिन्दी में कृष्ण भक्ति साहित्य की शुरुआती रचना है, जिस पर जयदेव और चण्डीदास जैसे कवियों द्वारा विकसित शृंगार मिश्रित भक्ति का प्रभाव साफ नज‍र आता है। हिन्दी साहित्य में पदावली के विषयवस्तु को लेकर गहरा विवाद है कि इन्हें भक्ति विषयक पद माना जाय या शृंगार विषयक |

विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि ये पद मूल चेतना में शृंगारिक हैं। इस मत के प्रमुख समर्थक आचार्य रामचंद्र शुक्ल अन्य समर्थकों में रामकुमार वर्मा, बाबूराम सक्सेना, हरप्रसाद शास्त्री, बच्चनसिंह तथा निराला शामिल हैं। इस वर्ग के विद्वानो का पदावली को श्रृंगारिक रचना मानने- के पीछे प्रमुख तर्क यह है कि यदि यह भक्तिपरक रचना होती तो इसमें सिर्फ संयोग श्रृंगार केन्द्र में क्यों होता? ईश्वर के अश्लील वर्णन को भक्तिपरक क्यों माना जाये ? दूसरा तर्क है कि विद्यापति आस्था की दृष्टि से शैव- भक्त' थे न वैष्णव भक्त । उनको यदि भक्ति करनी होती तो वे शिव-पार्वती की करते, न कि राधा-कृष्ण की। तीसरा तर्क यह है कि पदावली के बहुत से पदों के अंत में आने वाला वाक्य राजा शिव सिंह रूप नारायण,लखिया देई पति माने" सिद्ध करता है कि रचना के केन्द्र में प्रतीकात्मक रूप में विद्यापति के आश्रयदाता राजा शिवसिंह हैं, कृष्ण की भक्ति तो सिर्फ एक बहाना है।

इस मत का आक्रामक समर्थन करते हुए आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में लिखा है कि "आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगो ने गीत गोविन्द को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी । विद्यापति शैव थे, उन्होनें इन पदों की रचना शृंगार रस की दृष्टि से की है, भक्ति के रूप में नहीं ।
विद्यापति को कृष्ण भक्त कवि न समझना चाहिए।

इस वर्ग के शेष विद्वानों ने भी, इस विवाद का निर्णय कुछ इस प्रकार दिया है। डा० रामकुमार वर्मा लिखते हैं कि- राधा-कृष्ण संबंधी जो पद विद्यापति लिखे हैं, उनमें भक्ति न होकर वासना है। निराला ने प्रतीकों की भाषा में इन पदों' को 'नागिन की लहर' के समान कहा है, तो बच्चन सिंह ने इसमें निहित आध्यात्मिकता को 'खजुराहों के मंदिरों की सी आध्यात्मिकता' कहा है।

दूसरे वर्ग में वे विद्वान हैं जो पदावली. को भक्तिपरक रचना मानते हैं। जार्ज ग्रियर्सन इस वर्ग के प्रतिनिधि विद्वान हैं। बाबू श्यामसुंदर दास तथा वजनंदन सहाय ने भी इस मत का समर्थन किया है। ग्रियर्सन ने  अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'मैथिली क्रिस्टोपैथी' में राधा - और 'का प्रतीक बताते हुए पदावली कृष्ण को आत्मा और परमात्मा का को भक्तिपरक रचना सिद्ध किया है। वे लिखते हैं 'राधा और कृष्ण वस्तुतः प्रतीक हैं और , राधा जीवात्मा का प्रतीक है कृष्ण परमात्मा का" जीवात्मा, परमात्मा से मिलने. के लिए पूर्णत: प्रयत्नशील हैं। बाबू श्याम सुन्दर दास ने ऐसा ही दावा करते हुए लिखा है कि कुछ अपवादस्वरूप प्रसंगों को छोड़ दिया जाय तो " अधिकांश स्थलों पर प्रिया राधा का प्रियतम कृष्ण के साथ बड़ा ही सात्विक वरसपूर्ण सम्मिलन प्रस्तुत किया गया है।

इन विद्वानों का प्रमुख तर्क है कि, पदावली के पद मंदिरों में भजन के रूप में गाये जाते हैं, यदि वह अश्लील होते तो इनकी 'प्रतिष्ठा क्यों होती ? चैतन्य महाप्रभु जैसे महान भक्त इन पदों के दीवाने थे । इससे इनका भक्तिपरक होना ही सिद्ध होता है। दूसरा तर्क है कि जब सूरदास जैसे कवि को अत्यधिक शृंगारिक वर्णन के बावजूद भक्त कवि माना जाता है तो विद्यापति को क्यों नहीं । एक तर्क यह भी है कि भक्तिकाल के अधिकांश भक्तकवियों जैसे- कृष्णदास व गोविन्द दास ने विद्यापति को भक्ति परंपरा में ही शामिल किया है।

स्पष्ट है कि यह विवाद अत्यंत जटिल है और किसी भी एकतरफा समाधान से इसे संतुष्ट नहीं किया जा सकता । वस्तुत: विद्यापति के यहां श्रृंगार और भक्ति के भाव इतनी गहराई से घुले मिले हैं कि 'पदावली' को इनमें से किसी एक भाव पर आधारित रचना कहना गलत होगा । ज्यादा संतुलित निर्णय यही होगा कि जिन पदों पर शृंगार अधिक हावी है, उन्हें' शृंगार परक मान लिया जाय जबकि शेष पदों को श्रृंगार एवं भक्ति का समन्वित रूपं माना जाय । -

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